Rani Lakshmibai of Jhansiरानी लक्ष्मीबाई , झाँसी

Posted on Mon, Oct 10, 2022 Hindi Historical Poetry

सिंहासन हील उठे, भृकुटि तानी थी

बुढे भारत में भी आयी फिर नयी जवानी थी

गुमी हुइ आज़ादी की कीमत सब ने पहचानी थी दूर फ़िरंगी को करने की सब ने मन में थानी थी

चमक उठी सन् सत्तावन में,वह तलवार पुरानी थी बुंदेले हरबोलों के मुख, हमने सुनी कहानी थी ख़ूब लडी मर्दानी से वह तो झाँसी वाली रानी थी

कानपुर के नाना की मुंहबोली बहेन छबीली थी लक्ष्मी बाइ नाम पिता की, वह सनतान अकेली थी नाना के संग पढ़ती, नाना के संग खेली थी बरछी, ढाल, कृपाण,कटारी, उसकी सेहली थी

वीर शिवाजी की गाथाएँ, उसको याद ज़ुबानी थी बुन्देल हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी थी खुब लडी मर्दानी से , वह तो झाँसी वाली रानी थी ———— भृकुटी याने eyebrows, त्योंरि